Tharnewslive विशेष कवरेज: राजधानी जयपुर और आसपास के क्षेत्रों में शिक्षा और अनुसंधान के नाम पर किस तरह से सरकारी घोषणाएं और प्रशासनिक सुस्ती फाइलों में दम तोड़ती हैं, इसकी एक बानगी हाल ही में सामने आई है। लगभग अठारह साल पहले जिस महत्वाकांक्षी ‘वैज्ञानिक मंत्र संस्थान’ की स्थापना को लेकर बड़े-बड़े दावे किए गए थे और ढिंढोरा पीटा गया था, वह आज भी बदहाली के आंसू रो रहा है। हैरानी की बात यह है कि इतने लंबे अंतराल के बाद भी इस प्रतिष्ठित संस्थान में न तो एक भी शैक्षणिक पाठ्यक्रम शुरू हो सका है और न ही सुचारू संचालन के लिए किसी स्थायी फैकल्टी या विशेषज्ञों की तैनाती की गई है। इस स्थिति ने राज्य के शिक्षा और शोध ढांचे पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे स्थानीय युवाओं और अकादमिक जगत में भारी निराशा का माहौल है।
प्रमुख आकर्षण और बिंदु (Highlights)
- अठारह साल पहले हुई थी संस्थान की स्थापना की घोषणा, आज भी ढांचा अधूरा।
- एक भी अकादमिक कोर्स या शैक्षणिक सत्र अभी तक नहीं किया गया शुरू।
- फैकल्टी और तकनीकी स्टाफ के बिना वीरान पड़ी हैं संस्थान की इमारतें।
- लाखों-करोड़ों के बजट के बावजूद धरातल पर नहीं उतरा वैज्ञानिक अनुसंधान का सपना।
- प्रशासनिक उदासीनता और लालफीताशाही के चलते प्रोजेक्ट फाइलों में उलझकर रह गया।
पूरे घटनाक्रम की कहानी (Full Story)
जब लगभग दो दशक पहले इस अनूठे वैज्ञानिक संस्थान की रूपरेखा तैयार की गई थी, तब प्रदेश के युवाओं को उम्मीद जगी थी कि उन्हें महानगरों की तरह उच्च स्तर का वैज्ञानिक प्रशिक्षण और शोध का अवसर अपने ही गृह राज्य में मिल सकेगा। घोषणा के शुरुआती चरण में कुछ शुरुआती औपचारिकताएं पूरी की गईं, जमीन का आवंटन हुआ और भवनों का निर्माण कार्य भी शुरू कर दिया गया। हालांकि, जैसे-जैसे समय बीता, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और नौकरशाही के पेचीदा चक्र में यह पूरा प्रोजेक्ट उलझता चला गया। आज स्थिति यह है कि इमारतें तो बनकर तैयार हो चुकी हैं, लेकिन वहां धूल फांक रहे कमरों में न तो विद्यार्थियों की चहल-पहल है और न ही शोधार्थियों की गूंज।
स्थानीय जानकारों और शिक्षाविदों का कहना है कि इस संस्थान को जिस विजन के साथ धरातल पर उतारना था, उसे समय पर पूरा करने में संबंधित विभाग पूरी तरह विफल रहे हैं। बजट आवंटन के नाम पर औपचारिकताएं तो पूरी होती रहीं, लेकिन कोर एकेडमिक प्लान यानी पाठ्यक्रम का डिज़ाइन, संबद्धता (Affiliation) और फैकल्टी रिक्रूटमेंट पॉलिसी पर कभी भी गंभीरता से काम नहीं किया गया। नतीजा यह हुआ कि अठारह साल का लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी यह संस्थान केवल एक बोर्ड टंगे हुए भवन से ज्यादा कुछ नहीं बन पाया है।
मुख्य सवाल और उनके जवाब (Key Questions & Answers)
सवाल 1: अठारह साल बीत जाने के बाद भी इस संस्थान में पढ़ाई क्यों नहीं शुरू हो पाई?
जवाब: प्रशासनिक लापरवाही, फैकल्टी की नियुक्ति न होना और सही समय पर पाठ्यक्रमों की रूपरेखा तैयार न कर पाना इसका मुख्य कारण रहा है।
सवाल 2: इस पूरी परियोजना पर अब तक जनता के कितने धन का उपयोग किया जा चुका है?
जवाब: हालांकि आधिकारिक आंकड़े अलग-अलग चरणों में जारी हुए हैं, लेकिन भवनों के निर्माण और बुनियादी ढांचे पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद इसका कोई आउटपुट नहीं मिला है।
सवाल 3: क्या आने वाले दिनों में इस संस्थान को पुनर्जीवित करने की कोई ठोस योजना है?
जवाब: हालिया रिपोर्टों के बाद सरकार पर दबाव बढ़ा है, और प्रशासनिक स्तर पर समीक्षा की बात कही जा रही है, परंतु धरातल पर अभी कोई पुख्ता बदलाव नजर नहीं आया है।
शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में इस प्रकार की देरी न केवल संसाधनों की बर्बादी है, बल्कि यह उन हजारों मेधावी छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है जो वैज्ञानिक क्षेत्रों में अपना करियर बनाना चाहते थे।
समापन और निष्कर्ष (Conclusion)
अंततः यह कहा जा सकता है कि अठारह वर्षों का यह कालखंड सरकारी घोषणाओं और धरातलीय क्रियान्वयन के बीच की खाई को स्पष्ट रूप से उजागर करता है। वैज्ञानिक मंत्र संस्थान का यह हाल इस बात का प्रमाण है कि केवल बड़ी घोषणाएं करने से विकास नहीं होता, बल्कि उसके लिए निरंतर मॉनिटरिंग, समयबद्ध लक्ष्य और जवाबदेही तय करना अनिवार्य है। यदि अब भी सरकार और संबंधित महकमे ने इस दिशा में त्वरित और कड़े कदम नहीं उठाए, तो यह संस्थान आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल एक सफेद हाथी बनकर रह जाएगा। समय की मांग है कि इस मामले में उच्च स्तरीय जांच बैठाकर दोषियों की जवाबदेही तय की जाए और जल्द से जल्द फैकल्टी की नियुक्ति कर नए सत्र से पाठ्यक्रम शुरू किए जाएं।
Author: Thar News Live







