Tharnewslive ब्यूरो: देश के निजी अस्पतालों में इलाज के दौरान मरीजों से वसूले जाने वाले बिलों में भारी अनियमितताओं का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के प्रमुख ने केंद्र सरकार को एक कड़ा पत्र लिखकर अस्पतालों द्वारा सामान्य रूप से उपयोग की जाने वाली चिकित्सा सामग्रियों (consumables) पर 2841% तक अधिक मूल्य वसूलने की गंभीर समस्या को उजागर किया है।
क्या है पूरा मामला?
हालिया जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि अस्पताल थोक दरों पर खरीदी गई दवाओं और सर्जिकल सामानों पर मरीजों से एमआरपी (MRP) के नाम पर मनमाना शुल्क ले रहे हैं। एफडीए के आंकड़ों के अनुसार, कुछ मामलों में लागत मूल्य और मरीज से लिए गए बिल के बीच का अंतर 2800 प्रतिशत से भी अधिक है। यह ‘परमिसिबल गैप’ या अनुमेय अंतर का सीधा दुरुपयोग है, जो आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रहा है।
एफडीए प्रमुख की केंद्र से मांग
महाराष्ट्र एफडीए प्रमुख ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से इस ‘परमिसिबल गैप’ को तत्काल विनियमित करने की अपील की है। उनका तर्क है कि स्वास्थ्य सेवाओं के व्यवसायीकरण के कारण मरीजों को आर्थिक शोषण का सामना करना पड़ रहा है।
अस्पतालों द्वारा दवाओं और कंज्यूमेबल्स पर अत्यधिक मुनाफाखोरी न केवल अनैतिक है, बल्कि यह स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है। केंद्र सरकार को एक स्पष्ट मूल्य नियंत्रण नीति लागू करनी चाहिए ताकि मरीजों को राहत मिल सके।
प्रमुख बिंदु:
- अस्पतालों में कंज्यूमेबल्स पर 2841% तक का अनुचित मुनाफा।
- थोक खरीद और खुदरा बिलिंग के बीच भारी अंतर।
- महाराष्ट्र एफडीए ने केंद्र से सख्त नीतिगत हस्तक्षेप की मांग की।
- मरीजों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को सस्ता और पारदर्शी बनाने पर जोर।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सरकार दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की खरीद पर एक पारदर्शी कैपिंग नहीं लगाती, तब तक निजी अस्पतालों की इस मनमानी को रोकना मुश्किल होगा। अब देखना यह है कि केंद्र सरकार इस दिशा में क्या ठोस कदम उठाती है।
Author: Thar News Live








