Tharnewslive ब्यूरो: ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) द्वारा हाल ही में शुरू किए गए ‘शरीयत जागरूकता अभियान’ को लेकर देश के प्रबुद्ध नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच तीखी प्रतिक्रिया देखी जा रही है। कई प्रमुख हस्तियों ने इस अभियान को आधुनिक भारत के संवैधानिक मूल्यों के विपरीत बताते हुए इसे समाज में विभाजन पैदा करने वाला कदम करार दिया है।
अभियान पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
आलोचकों का तर्क है कि 21वीं सदी में जब देश प्रगति की ओर अग्रसर है, तब इस तरह के अभियान महिलाओं के अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित करने का प्रयास करते हैं। प्रबुद्ध वर्ग का मानना है कि पर्सनल लॉ के नाम पर रूढ़िवादी प्रथाओं को बढ़ावा देना न केवल असंवैधानिक है, बल्कि यह मुस्लिम समुदाय के भीतर सुधारवादी आवाजों को दबाने की एक कोशिश भी है।
देश के संविधान से ऊपर कोई भी धार्मिक संस्था या उसका एजेंडा नहीं हो सकता। समय की मांग है कि हम समानता और न्याय की बात करें, न कि पुरानी और दमनकारी परंपराओं के संरक्षण की।
प्रमुख चिंताएं और मांगें
इस विरोध प्रदर्शन में शामिल बुद्धिजीवियों ने कुछ मुख्य बिंदुओं पर अपनी चिंताएं जाहिर की हैं:
- समान नागरिक संहिता (UCC) की दिशा में बढ़ते कदमों को रोकने का प्रयास।
- महिलाओं के लिए न्यायपूर्ण और समान अधिकारों की अनदेखी।
- धार्मिक कट्टरपंथ को बढ़ावा देने वाली विचारधारा का प्रसार।
- आधुनिक शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बजाय पुराने ढर्रे पर चलने का दबाव।
आगे की राह
नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने सरकार से मांग की है कि वह ऐसे अभियानों पर कड़ी नजर रखे जो सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ने का काम करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी समुदाय के भीतर सुधार की प्रक्रिया अंदर से आनी चाहिए, न कि बाहरी दबाव या कट्टरपंथी एजेंडे के माध्यम से थोपी जानी चाहिए। अब देखना यह होगा कि बोर्ड इस बढ़ते विरोध पर क्या रुख अपनाता है और क्या वह अपने अभियान की रूपरेखा में कोई बदलाव करेगा।
Author: Thar News Live








