Tharnewslive ब्यूरो: पुणे शहर में त्योहारों के दौरान होने वाले अत्यधिक शोर-शराबे और ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ विद्यानंद बापट की आवाज अब एक बड़े आंदोलन का रूप ले रही है। बापट का तर्क है कि उत्सव मनाना हमारी संस्कृति का हिस्सा है, लेकिन यह दूसरों की शांति और स्वास्थ्य की कीमत पर नहीं होना चाहिए। उन्होंने शहर की बिगड़ती ध्वनि स्थिति पर चिंता जताते हुए प्रशासन से कड़े कदम उठाने की मांग की है।
परंपरा बनाम जन-स्वास्थ्य का संघर्ष
विद्यानंद बापट का मानना है कि त्योहारों का मूल उद्देश्य आनंद और सामूहिकता है, न कि कान फोड़ देने वाला संगीत। वे कहते हैं कि लाउडस्पीकरों के अनियंत्रित इस्तेमाल से बुजुर्गों, बीमारों और छात्रों को सबसे अधिक परेशानी होती है। उनकी यह मुहिम पुणे के कई रिहायशी इलाकों में गूंज रही है, जहां स्थानीय लोग अब शांतिपूर्ण तरीके से त्योहार मनाने का समर्थन कर रहे हैं।
त्योहार हमारी आस्था का प्रतीक हैं, लेकिन आस्था का मतलब शोर नहीं होता। हम परंपराओं का सम्मान करते हैं, लेकिन ध्वनि प्रदूषण पर लगाम लगाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है, ताकि हर नागरिक सम्मान के साथ जी सके। – विद्यानंद बापट
विवादों के बीच बढ़ती लोकप्रियता
बापट की इस पहल को जहां एक तरफ व्यापक जनसमर्थन मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ उन्हें कुछ आयोजकों के विरोध का भी सामना करना पड़ रहा है। आलोचकों का तर्क है कि यह उत्सव की भावना को सीमित करने का प्रयास है। हालांकि, बापट अपनी बात पर अडिग हैं और उनका कहना है कि वे किसी धर्म या परंपरा के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि वे केवल ‘ध्वनि मुक्त’ उत्सवों की वकालत कर रहे हैं।
आंदोलन के मुख्य बिंदु:
- त्योहारों के दौरान ध्वनि प्रदूषण के स्तर को नियंत्रित करना।
- सार्वजनिक स्थानों पर लाउडस्पीकर के उपयोग के लिए सख्त नियमों का पालन।
- नागरिकों के स्वास्थ्य और शांति के अधिकार की रक्षा।
- परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाने के लिए जागरूकता अभियान।
पुणे के नागरिक अब इस बहस को गंभीरता से ले रहे हैं। देखना यह होगा कि क्या प्रशासन बापट की इन मांगों को स्वीकार कर शहर में त्योहारों के दौरान शांतिपूर्ण वातावरण सुनिश्चित कर पाता है या नहीं।
Author: Thar News Live








