32 साल तक 67 रुपये के लिए कंडक्टर से लड़ता रहा DTC, दिल्ली हाईकोर्ट ने लगाया 1 लाख का जुर्माना

32 साल तक 67 रुपये के लिए कंडक्टर से लड़ता रहा DTC, दिल्ली हाईकोर्ट ने लगाया 1 लाख का जुर्माना

न्याय व्यवस्था का दुरुपयोग: DTC को हाईकोर्ट की फटकार

दिल्ली परिवहन निगम (DTC) को एक बेहद शर्मनाक और हैरान करने वाले मामले में दिल्ली हाईकोर्ट से कड़ी फटकार मिली है। मामला एक बस कंडक्टर की बर्खास्तगी और उसके वेतन भुगतान से जुड़ा है, जो पिछले 32 वर्षों से अदालतों में लंबित था। हाईकोर्ट ने इस लंबी कानूनी लड़ाई को न्याय प्रणाली का दुरुपयोग करार देते हुए DTC पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।

मामले की पृष्ठभूमि: 67 रुपये का विवाद

यह विवाद तब शुरू हुआ जब एक बस कंडक्टर को कथित तौर पर सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। कंडक्टर ने अपनी बर्खास्तगी के बाद 17 महीने के बकाया वेतन की मांग की थी। दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे मामले की जड़ में महज 67 रुपये का विवाद था, जिसे लेकर DTC ने तीन दशकों से अधिक समय तक कानूनी लड़ाई जारी रखी। tharnewslive.com की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, निगम ने निचली अदालत और ट्रिब्यूनल के फैसलों को बार-बार चुनौती दी, जिससे न केवल सरकारी खजाने पर बोझ पड़ा, बल्कि एक कर्मचारी को भी दशकों तक मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी।

अदालत की सख्त टिप्पणी

न्यायमूर्ति की पीठ ने सुनवाई के दौरान DTC के रवैये पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। अदालत ने कहा कि एक लोक उपक्रम होने के नाते DTC को अपने कर्मचारियों के प्रति अधिक संवेदनशील होना चाहिए था, न कि मामूली राशि के लिए दशकों तक कानूनी दांव-पेच में उलझे रहना चाहिए था। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानूनी प्रक्रिया का उपयोग किसी को परेशान करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

tharnewslive.com संवाददाता के अनुसार, अदालत ने अपने आदेश में कहा कि DTC का यह कृत्य न केवल समय की बर्बादी है बल्कि यह न्यायिक संसाधनों का भी दुरुपयोग है, जिसके लिए निगम को हर्जाना भरना ही होगा।

मुख्य बिंदु और निष्कर्ष

  • DTC ने 32 साल तक एक कंडक्टर के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी।
  • विवाद का मुख्य कारण 17 महीने का बकाया वेतन और महज 67 रुपये की राशि थी।
  • दिल्ली हाईकोर्ट ने DTC की याचिका को खारिज करते हुए 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया।
  • अदालत ने इसे न्याय प्रणाली का दुरुपयोग और सरकारी संसाधनों की बर्बादी माना है।

यह मामला सरकारी संस्थानों में व्याप्त लालफीताशाही और संवेदनहीनता का एक बड़ा उदाहरण है। 32 साल की लंबी लड़ाई के बाद अब हाईकोर्ट के इस फैसले ने कर्मचारी को राहत दी है, लेकिन यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या सरकारी विभाग अपनी गलतियों से कभी सबक लेंगे?

Thar News Live
Author: Thar News Live

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