tharnewslive.com ब्यूरो: देश में गिद्धों की घटती आबादी और उनके अस्तित्व पर मंडराते संकट को देखते हुए केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। सरकार अब देश भर में ‘गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र’ (Vulture Safe Zones) बनाने की योजना पर काम कर रही है, ताकि इन प्राकृतिक सफाईकर्मियों को विलुप्त होने से बचाया जा सके।
संकट में गिद्धों का अस्तित्व
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ दशकों में गिद्धों की संख्या में 90 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है। इसका मुख्य कारण पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली ‘डिक्लोफेनाक’ जैसी दवाएं हैं। जब गिद्ध इन मृत पशुओं का मांस खाते हैं, तो ये दवाएं उनके लिए जानलेवा साबित होती हैं।
केंद्रीय मंत्री ने अपने बयान में कहा, ‘गिद्ध पारिस्थितिकी तंत्र का एक अनिवार्य हिस्सा हैं। यदि हमने समय रहते इनके लिए सुरक्षित वातावरण तैयार नहीं किया, तो पर्यावरण का संतुलन बिगड़ना तय है। हम जल्द ही देश के विभिन्न हिस्सों में विशेष सुरक्षित जोन चिन्हित करेंगे।’
सुरक्षित जोन की कार्ययोजना
सरकार की इस नई पहल के तहत निम्नलिखित कदम उठाए जाएंगे:
- गिद्धों के प्राकृतिक आवासों के आसपास ‘डिक्लोफेनाक-मुक्त’ क्षेत्र घोषित करना।
- स्थानीय पशुपालकों को गिद्धों के लिए सुरक्षित दवाओं के प्रति जागरूक करना।
- गिद्धों के प्रजनन केंद्रों की संख्या में वृद्धि करना और उनकी निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग।
- वन्यजीव विशेषज्ञों की एक विशेष टीम का गठन जो इन जोन की नियमित मॉनिटरिंग करेगी।
पर्यावरण संतुलन के लिए क्यों जरूरी हैं गिद्ध?
गिद्धों को ‘प्रकृति का सफाईकर्मी’ कहा जाता है। ये मृत पशुओं के शवों को खाकर बीमारियों को फैलने से रोकते हैं। यदि गिद्धों की आबादी पूरी तरह खत्म हो जाती है, तो इससे न केवल गंदगी बढ़ेगी, बल्कि रेबीज और एंथ्रेक्स जैसी बीमारियों के फैलने का खतरा भी कई गुना बढ़ जाएगा। सरकार का यह कदम न केवल वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी एक सुरक्षा कवच का काम करेगा।
Author: Thar News Live








